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पाकिस्तान पर भारी पड़े उसी के दांव, तालिबान के सत्ता में आने के बाद देश में हुए सबसे ज्यादा आतंकी हमले

तालिबान का अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज होना पाकिस्तान के लिए बुरा साबित हुआ है. इस आतंकी संगठन की सरकार से पाकिस्तान कई उम्मीदें लगाए बैठा था, इसके लिए उसने पैसे से मदद करने सहित आतंकियों को पनाह देने तक का काम किया है. लेकिन पिछले साल अगस्त में जैसे ही तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, वैसे ही पाकिस्तान में आतंकी हमलों (Terror Attacks) में इजाफा होने लगा. अगस्त महीने में पाकिस्तान में ऐसे हमले अपने उच्च स्तर पर पहुंच गए थे. ये जानकारी एक शोध में सामने आई है.

यह शोध पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडी (PICSS) ने किया है. उसने कहा है कि साल 2021 में एक महीने में सबसे अधिक हमले अगस्त में दर्ज किए गए थे, जब 45 हमलों को आतंकवादियों ने अंजाम दिया था. स्थानीय अखबार डॉन के अनुसार, संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 10 नवंबर से 10 दिसंबर तक एक महीने के संघर्ष विराम के बावजूद आतंकवादी हमलों की संख्या में कमी नहीं आई है (Taliban Attack Pakistan Army). अखबार ने कहा है कि पाकिस्तान में हर महीने आतंकवादी हमलों की औसत संख्या 2020 में 16 से बढ़कर 2021 में 25 हो गई है, जो 2017 के बाद सबसे अधिक है.

103 हमलों में 170 लोगों की मौत

आंकड़ों से पता चला है कि बलूचिस्तान, पाकिस्तान का सबसे अशांत प्रांत है. जहां 103 हमलों के कारण 170 लोगों की मौत हुई है. रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान में ही सबसे अधिक घायलों की संख्या भी दर्ज की गई है, हमलों में घायल हुए लोगों में से 50 फीसदी से अधिक इसी प्रांत में हमले का शिकार हुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa) बलूचिस्तान के बाद दूसरा सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है. विशेषज्ञ पाकिस्तान के अफगानिस्तान में हो रहे हस्तक्षेप पर चिंता जता रहे हैं. इनका मानना है कि पाकिस्तान सार्वजनिक तौर पर तालिबान का साथ दे रहा है, जिससे केवल क्षेत्रीय संघर्ष ही बढ़ेगा.

सैन्य प्रतिष्ठान पर पड़ सकता है असर

इस स्थिति के पीछे का कारण नेताओं का निजी स्वार्थ भी है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि पाकिस्तान की करतूतें उसी पर भारी पड़ सकती हैं. इसका असर विशेष रूप से उसके सैन्य और खुफिया प्रतिष्ठान पर पड़ सकता है (Taliban Against Pakistan). हालांकि तमाम हमलों के बावजूद भी पाकिस्तान सरकार तालिबान के प्रति नरम बनी हुई है. प्रधानमंत्री इमरान खान खुद कई मौकों पर तालिबान के प्रवक्ता की तरह बोलते दिखाई देते हैं.

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